0:18 हमारे पिछले दो सत्रों में हम यह देख रहे थे कि परमेश्वर का मूल उद्देश्य मनुष्य के लिए क्या था जब उसने पहले उसको बनाया और कैसे परमेश्वर ने मनुष्य को जानवरों से अलग बनाया और मनुष्य की सारी जरूरतों के लिए 0:37 परमेश्वर ने प्रावधान करके रखा था। अगर इन मूलभूत बातों को हम समझ जाए तो हम अपने पूरे अस्तित्व को परमेश्वर के लिए खोल देंगे। अपने आप को पूरी तरीके से समर्पित करेंगे कि परमेश्वर हर समय हर क्षेत्र में अपने काम को हम में पूरा करें। यह सिर्फ 0:55 इस वजह से क्योंकि हम समझते नहीं या स्वीकार नहीं करते या विश्वास नहीं करते। इन स्पष्ट बातें जो बाइबल में शुरुआत में लिखी गई है। हम उनको देख नहीं पाते। शैतान ने हमारी आंखों को इनके प्रति अंधा किया है कि हम पाते हैं कि हमारा मसीह जीवन 1:10 इतना असंतोषजनक है। औसत मसीह ही नया जन्म पाया हुआ मसीह। अगर आप उनसे पूछे और अगर वह आपको एक ईमानदार जवाब दें तो वह यह बात मानेगा कि उसका मसीह जीवन उसको तृप्त नहीं करता संतोषजनक नहीं है और फिर भी परमेश्वर चाहता है कि हमारा जीवन बिल्कुल तृप्त 1:29 करने वाला हो पर यह तब तक संभव नहीं है जब तक हम विश्वास ना करें कि संपूर्ण समर्पण परमेश्वर के प्रति वह हमारे जीवन के लिए सर्वोत्तम है। अब हम देखना चाहते हैं मनुष्य जाति में पाप का स्रोत पाप की उत्पत्ति क्या थी 1:48 जैसे हम पाते हैं उत्पत्ति उसके तीसरे अध्याय में उन पहले कुछ अध्यायों में उत्पत्ति के हम कुछ मूलभूत सिद्धांतों को पाते हैं कई बातों के विषय में मनुष्य का परमेश्वर के 2:04 साथ जो संबंध है जो हमारी सहायता करते हैं यह समझने के लिए कि हमारे जीवन में कैसा ऐसा होना चाहिए। उदाहरण स्वरूप उत्पत्ति तीसरे अध्याय में हम कई बातों को देखते हैं प्रलोभन के संबंध में। अगर हम देखेंगे और इस पर मनन करेंगे। मेरा 2:22 विश्वास है यह हमें कुछ बातें समझाएगा कि शैतान की युक्तियां कैसी है। ताकि हम वैसे ही ना फंसाए जाए। यहां हम पढ़ते हैं पहली बात जो शैतान ने 2:37 की वह थी आकर हवा के पास आकर उसको परमेश्वर के वचन पर प्रश्न खड़ा करने पर वह मजबूर करता है और वह आज भी ऐसे ही आता है क्या यह सचमुच परमेश्वर का वचन है क्या परमेश्वर ने सचमुच कहा है इस बात को क्या 2:56 यह जरूरी है कि परमेश्वर जो हमें कहता है वह हम करें क्या यह क्या परमेश्वर की बात नहीं मानना उसमें कोई खतरा है? और शैतान उस नीव को हमारे जीवन से परमेश्वर के वचन की नीव को निकाल लेना चाहता है ताकि हम उस मनुष्य के 3:14 जैसे बनाए जो अपने घर को बालू पर बांधता है और उसका घर गिर जाता है और वही उसने हवा के साथ भी किया। वो हवा के पास आकर कहता है क्या परमेश्वर ने सचमुच कहा है और इन सारे शताब्दियों में पर शैतान यही करते आया है परमेश्वर के वचन पर प्रश्न करते 3:29 आया है परमेश्वर का वचन कहता है विश्वास सुनने से और सुनना मसीह के वचन के द्वारा होता है और अगर शैतान इस बात में सफल हो जाता है कि वह मसीह के वचन को हमारे पैरों से हमारे जीवन से निकाल दे तो फिर हमारे पास विश्वास के लिए कोई आधार ही नहीं 3:45 बचेगा और विश्वास का विरोधी है भय और इसलिए हम पाते हैं कि इस संसार में ऐसे लोगों से भरा है जिनका जिन्हें भय जो भयभीत है उनका जीवन बालों पर बांधा हुआ है और यहां हम एक और बात को देखते हैं शैतान आकर हवा को बताने की कोशिश करता है कि अगर 4:03 आप परमेश्वर के वचन को ना मानो तो यह इतना गंभीर नहीं है और वह यह बताने की कोशिश कर रहा है परमेश्वर इतना अच्छा परमेश्वर है वो तुमको पीड़ा नहीं होने देगा और तुमको दूर नहीं करेगा सिर्फ तुमने एक बार एक क्षेत्र में उसकी बात नहीं मानी इसलिए 4:19 नहीं नहीं परमेश्वर इसको नजरअंदाज करेगा। वह तो प्रेम करने वाला परमेश्वर है। और यद्यपि उसने कहा है तुम मरोगे अगर तुम आज्ञा नहीं मानोगे और इस वृक्ष के फल को खाओगे पर तुम नहीं मरोगे। चिंता मत करो। पाप तब आया 4:36 जब उस स्त्री ने तय किया कि शैतान क्या कहता है उस पर भरोसा करें। इसके बजाय कि परमेश्वर क्या कहता है उस पर भरोसा करें। और वही पाप की शुरुआत थी। जब हम शैतान की बात मानना शुरू करते हैं। इसके बजाय कि परमेश्वर की बात माने और शैतान किन बातों 4:51 को कहता है वो कहता है पाप गंभीर नहीं है। तुम दंड नहीं पाओगे अगर तुम कोई गलत गलत करो तो और नर्क जैसा कुछ नहीं है और अनंत मृत्यु ऐसा कुछ भी नहीं है। यह वह कुछ बातें हैं जिनको शैतान मनुष्य जाति को कई 5:10 वर्षों से कहते आया है। झूठ है। तुम निश्चित ना मरोगे। वो कहता है उत्पत्ति तीन उसके चौथे वचन में और आज मसीह जीवन को में अगर हम इसको लागू करें तो कि एक मसीह के साथ क्या होगा जो अपने 5:27 शरीर के अनुसार जीता है मैं उनकी बात कर रहा हूं जो नए जन्म पाए हुए मसीह है जो अपने मसीह जीवन के विषय में सतर्क नहीं है पर अपने शरीर के इच्छाओं के अनुसार अभिलाषाओं के अनुसार जीना वो जारी रखते हैं। रोमियो की पत्री उसके आठवें अध्याय 5:44 में हम यह पढ़ते हैं। यह नए जन पाए हुए मसीह को लिखा गया है। यह बिल्कुल स्पष्ट है क्योंकि रोमियो 8 12 में लिखा है। इसलिए हे भाइयों वो गैर मसीहों से बात नहीं कर रहा। वो कहता है हे भाइयों हम शरीर के कर्जदार नहीं है कि शरीर के 6:00 अनुसार दिन काटे। 13वा वचन क्योंकि यदि तुम शरीर के अनुसार दिन काटोगे तो मरोगे। रोमियो 8 13 यदि आत्मा से देह की क्रियाओं को मारोगे तो जीवित रहोगे। वो यहां मसीहों को क्या कह रहा है? नया 6:25 जन्म पाए हुए मसीह। अगर तुम जो मसीह हो शरीर के अनुसार जियो तो अपने शरीर की इच्छा है शरीर की अभिलाषाएं यह पाप में स्वभाव की जो हमारे शरीर के अंदर है तो तुम जरूर मरोगे जैसे परमेश्वर ने आदम से कहा था तुम अवश्य 6:45 उस दिन मर जाओगे और शैतान ने आकर हवा से क्या कहा तुम निश्चित नहीं मरोगे और आज कई मसीहों को क्या प्रचार किया जा रहा है कई प्रचारकों द्वारा आज 7:03 अगर आप नया जन पाते हो अगर आपने एक बार मसीह को स्वीकार किया है और आप अपने शरीर के अनुसार जीते हो तो आप नहीं मरोगे आप अनंत काल के लिए सुरक्षित हो क्या यह वही भाषा नहीं है जिसका प्रयोग शैतान ने 7:19 किया था जब परमेश्वर कहता है इन दो वचनों की तुलना करके देखें परमेश्वर ने आदम से कहा अगर अगर तुम इस भले बुरे के वृक्ष से खाओगे तो तुम अवश्य मरोगे। और परमेश्वर आज रोमियो 8:3 में कहता है भाइयों अगर तुम शरीर के अनुसार जिओगे तो तुम जरूर मरोगे। 7:36 शैतान ने उस परमेश्वर के वचन को लेकर कहा तुम नहीं मरोगे। और आज शैतान परमेश्वर के इस वचन को लेकर कहता है तुम अगर शरीर की अभिलाषाओं के अनुसार जियो तो तुम नहीं मरोगे। क्योंकि एक बार तुमने मसीह को स्वीकार किया। यह कैसे संभव है कि तुम 7:49 मरोगे। यह असंभव है। और क्या आप जानते हो कितने लोग हैं लाखों लाखों मसीही जिनको मसी शैतान ने भ्रमाया है, फंसाया है। उनको यह विश्वास करने पर विवश करके कि एक बार उन्होंने मसीह को स्वीकार किया है तो उनके लिए मरना संभव नहीं है। परमेश्वर का वचन 8:06 कहता है लुका तीन उसके आखिरी अध्याय में आखिरी वचन में कि आदम परमेश्वर का पुत्र था। लुका तीन इसके आखिरी वचन में हम यह पाते हैं। पर वह मर गया। वह अनंत काल के लिए खो गया क्योंकि उसने आज्ञा नहीं मानी। आज क्या होगा जब परमेश्वर का एक पुत्र यह तय करता है कि वह 8:24 शरीर के अनुसार जिएगा। क्या रोमियो 8:13 में परमेश्वर का जो वचन है वह पूरा होगा? तुम जरूर मरोगे। हां, वह पूरा होगा। पर शैतान परमेश्वर के वचन पर प्रश्न खड़ा करता है और उसका पूरा उद्देश्य यही है कि वह मनुष्य को फंसाए और मनुष्य को पाप में 8:42 जीने पर मजबूर करें ताकि वह अनंत काल शैतान के साथ नर्क में काटे वो उसका उद्देश्य है। पौलुस ने एक बार उसके एक पत्री में कहा दूसरा कोरंथ दूसरे अध्याय में हम उसके युक्तियों से अनजान नहीं है। शैतान की युक्तियों से अनजान नहीं है। 8:56 शैतान की युक्तियां जो है और हमें उनके विषय में अनजान नहीं होना है। और हमें अनजान होने की जरूरत नहीं अगर हम बाइबल को पढ़े तो। क्योंकि उसकी सारी युक्तियां वही है जो उसने पहले से ही इस्तेमाल की है। यहां उसका एक उदाहरण हम 9:13 देखते हैं ताकि आप परमेश्वर के वचन पर सवाल खड़ा करो और उसका इंकार करो। उसको और यह कहता है कि वह नहीं होगा। और यह पहली बात है जो हम सीख सकते हैं जिससे हम एक चेतावनी ले सकते हैं। उत्पत्ति उसके तीसरे अध्याय में अगर आप एक 9:31 विजय जीवन जीना चाहते हो अगर आप वैसा जीना चाहते हो जैसा परमेश्वर चाहता है तो आप परमेश्वर के वचन को बिल्कुल वैसा ही स्वीकार करें जैसा लिखा गया है। दूसरी बात जो मैं चाहता हूं कि आप यहां देखो जब शैतान हवा से बात कर रहा था। वह 9:48 उसको ऐसा कुछ कहता है जिसके पीछे अर्थ यह था कि परमेश्वर सचमुच तुमसे प्रेम नहीं करता। जैसा तुम सोचते हो वह करता है। वो सचमुच तुम्हारे लिए सबसे अच्छा नहीं चाहता। उसके मन में तुम्हारा सर्वोत्तम नहीं है। वह तुमसे कोई बात रोके रखना 10:05 चाहता है। देखिए वो क्या कहता है उत्पत्ति उसके तीसरे अध्याय में पांचव वचन में दूसरी बात जो वह हवा से कहता है। परमेश्वर आप जानता है कि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आंखें खुल जाएंगी और तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्वर के तुल्य 10:23 हो जाओगे और परमेश्वर नहीं चाहता कि तुम उसके जैसा बनो यह क्या बड़ा झूठ है और यह अद्भुत है यह देखना कैसे शैतान सफल हुआ कि हवा में हवा को इसमें विश्वास कराने पर और यह अद्भुत है कि आज भी कैसे शैतान सफल होता 10:41 है कई लोगों को इस बात पर विश्वास करने पर मजबूर करता है। एक झूठ पर विश्वास करने पर मानो परमेश्वर हमसे किसी बात को रोकना चाहता है। कोई अच्छी वस्तु को जो हमारे लिए अच्छी है? यह कैसे संभव है? क्या परमेश्वर ने मनुष्य को इस वजह से 11:00 बनाया ताकि उससे भली बातों को वह दूर रखें? नहीं। फिर उसको बनाने की आवश्यकता क्या थी? पूरा उद्देश्य मनुष्य को बनाने का यही था कि परमेश्वर उसको आशीष दे और उसकी सारी वह बातें दे ताकि परमेश्वर मनुष्य खुद परमेश्वर के सब स्वभाव का 11:16 संभागी बने और सारे सृष्टि पर अधिकार करें। पर शैतान ने परमेश्वर की एक गलत छवि आदम के सामने रखी। परम ऐसा परमेश्वर जो प्रेम नहीं करता और तुमसे एक अच्छी बात को दूर रखना चाहता है और वह मनुष्य से कहता है अब तुम अपने आप की देखभाल करो क्योंकि 11:32 परमेश्वर आपकी देखभाल नहीं करने वाला। यह क्या ही बड़ा झूठ है। जब उसने परमेश्वर को बनाया ही इसी उद्देश्य से था कि उसकी वो आशीष आशीष करें और सारी जरूरतें पूरा करें और शैतान उसको एक झूठ पर विश्वास कराता है और हम आज भी यही पाते हैं शैतान आज भी मसीहों को यही 11:51 बात विश्वास करने पर विवश करता है कि परमेश्वर आपकी देखभाल नहीं करता है इसलिए उसने उनकी यह प्रार्थना नहीं सुनी और वह यह कहता है क्यों परमेश्वर ने तुम्हारे बच्चे की मौत होने दी क्यों उस बीमारी को आने दे। यह इस बात को 12:09 साबित करता है कि वह तुमसे प्रेम नहीं करता। और कई मसीह लोग हैं जो इस पर विश्वास करते हैं। और जब वो इस पर विश्वास करते हैं तो उसके क्या होता है? उदासीनता, निराशा, परमेश्वर के प्रति क्रोध जिसकी वजह से शरीर में और बीमारी आती है और कई अन्य 12:27 समस्याएं। अगर शैतान इस बात में सफल हो जाए कि वह आपको इस पर विश्वास करा दे इस झूठ पर कि परमेश्वर आपसे प्रेम नहीं करता और वह आपकी देखभाल नहीं करना चाहता। वह आपकी सारी जरूरतें पूरा नहीं करेगा तो फिर वह सफल हो 12:46 जाएगा। आपको पहला कदम उठाने के लिए पाप के प्रति एक पराजित जीवन के प्रति पहला कदम इस पर विश्वास करना है कि परमेश्वर हमसे प्रेम नहीं करता। विश्वास नए नियम में विश्वास के विषय में इतना कुछ लिखा है। विश्वास ये है कि हम इस पर विश्वास करें कि परमेश्वर 13:05 हमसे प्रेम करता है। यह पाप नहीं करने से भी अधिक जरूरी है। जब पतरस गिरने वाला था यीशु मसीह का तीन बार वो इंकार करने वाला था तो प्रभु ने उसको चेताया कि तुम तीन बार मेरा इंकार करने वाले हो पत्ररस। पर मैं यह प्रार्थना नहीं करना कि तुम मेरा इंकार ना करो। शायद 13:23 यह जरूरी है तुम्हारे घमंड को तोड़ने के लिए। पर मैं यह इसके लिए प्रार्थना कर रहा हूं। एक बार तुम मेरा इंकार करो और शैतान ने तुम्हें पकड़ लिया हो और तुम बिल्कुल गड्ढे के नीचे पहुंच जाओ निचले स्तर पर। मैं चाहता हूं कि तुम इसको याद रखो कि 13:38 परमेश्वर तुमसे प्रेम करता है और उसी बात के लिए मैं प्रार्थना कर रहा हूं कि तुम्हारा विश्वास जाता ना रहे। परमेश्वर ने प्रभु ने पत्रस से कहा कि मैं प्रार्थना कर रहा हूं। तुम्हारा विश्वास जाता ना रहे। उसका अर्थ है कि तुम उस अंत 13:52 के स्थान पर भी पहुंच जाओ। तो मैं चाहता हूं कि तुम वहां भी विश्वास रखो कि परमेश्वर तुमसे प्रेम करता है। तब भी तुमसे प्रेम करता है। वो फिर भी तुमसे प्रेम करता है। वो है विश्वास कि हम विश्वास करें। यद्यपि हम अपने जीवन में असफल हुए हैं। हमने कुछ गलत किया है। 14:08 परमेश्वर आज भी हमसे प्रेम करता है। कितना अधिक जब हम उसको प्रसन्न करना चाहते हैं। जब हम पापी थे उसने हमसे प्रेम किया। जब हम उसके शत्रु थे उसने हमसे प्रेम किया तो कितना अधिक अब जब हम उसके संतान हैं। 14:26 एक बात जो हम बिल्कुल शुरुआत में देखते हैं मनुष्य को बनाने के और मनुष्य के पतन के बिल्कुल शुरुआत से कि मनु शैतान का उद्देश्य यह है कि हम परमेश्वर के वचन पर शक करें और परमेश्वर के प्रेम पर शक करें और अगर वह इन दो क्षेत्रों में सफल हो जाए 14:43 आपके जीवन में। मैं आपको अभी कहना चाहता हूं कि आपका गिरना तय है। आप जरूर गिरोगे। वह हमें तुरंत पाप में नहीं ले जाता। वह हमारी नीव को निकाल लेता है। और फिर हम अपने आप ही गिर जाते हैं। हम निराश हो जाते हैं। हम कहते हैं अगर परमेश्वर मुझसे 15:02 प्रेम नहीं करता। अगर वो मेरे प्रार्थनाओं का जवाब नहीं देगा तो मेरे लिए क्या आशा है? फिर हम निराश हो जाते हैं और शैतान हमें और पाप में ले जाता है। दूसरी बात जो मैं आप मैं चाहता हूं कि आप देखें। वह जो स्त्री थी उसने अपने ही इंद्रियों 15:18 पर विश्वास किया। उसने देखा अपनी आंखों से कि वो वृक्ष खाने के लिए अच्छा है। दूसरी बात जो हमें इन वचनों से सीखना है कि हम अपने इंद्रियों पर विश्वास नहीं कर सकते। अगर हम अपने इंद्रियों पर विश्वास 15:36 करें तो हम धोखा पाएंगे। हम भटक जाएंगे। हम अपने इंद्रियों पर विश्वास नहीं कर सकते। उदाहरण स्वरूप अगर आप अपने इंद्रियों पर भरोसा रखो तो आपको लगेगा यह सूर्य इस पृथ्वी का चक्कर काटता है। क्योंकि हम हर दिन देखते हैं यह 15:55 सूर्य उठता है और ढल जाता है शाम को। और अगर आप आपके इंद्रियों पर विश्वास करते तो आप कहते यह सूर्य है जो हिल रहा है। नहीं सूर्य नहीं हिल रहा। हमें बस लगता है कि वह हिल रहा है। यह पृथ्वी है जो चक्कर काट रही है। और उस वजह से हमें लगता है कि वह सूर्य जो 16:13 वाकई में नहीं हिल रहा वह हिल रहा है। और परमेश्वर ने उसको इस वजह से रखा है ताकि हम हर दिन इस बात को वह हमें सिखाए कि अपने इंद्रियों पर विश्वास ना रखें। आप जिस पर देखते हो उस पर विश्वास ना रखें। हम भूगोल से जानते हैं कि यह जो पृथ्वी है 16:30 यह चक्कर काटती है। और लगभग 1000 मील प्रति घंटे के रफ्तार से वह चक्कर काट रही है। और जब हम इस पृथ्वी को देखते हैं, हमें नहीं लगता कि पृथ्वी हिल रही है। वह बिल्कुल स्थिर लगती है, शांत लगती है। पर आपके पैरों के नीचे की जो जमीन है, वो 16:50 1000 मील प्रति घंटे के रफ्तार से घूम रही है। मानो 1600 कि.मी. प्रति घंटे की रफ्तार से। उतनी तेजी से वह घूम रही है। पर फिर भी हमें तो बिल्कुल वो महसूस नहीं होता। आप आपके इंद्रियों पर विश्वास नहीं रख सकते। यही संदेश है जो हमें इन वचनों से आता है। 17:07 अगर आप अपने इंद्रियों के उस से जाओगे तो आप धोखा खाओगे। उस स्त्री ने देखा वो अपने इंद्रियों पर भरोसा रखा। मुझे लगता है यह अच्छा है। पर वो आपके लिए अच्छा नहीं है। देखिए कितने लोग जो दारू पीते हैं, सिगरेट लेते हैं और खतरनाक ड्रग्स लेते हैं। उनको 17:23 वो उसके पास देखते हैं और वह कहते हैं कि मुझे लगता है यह मेरे लिए अच्छा है। वह आपके लिए अच्छा नहीं है। वह आपके शरीर को नाश कर देगा। यह दूसरी बात है जो हम यहां देखते हैं और जब मनुष्य इस प्रकार गिर जाता है 17:41 परमेश्वर आदम हवा से क्या चाहत रखता था सिर्फ यह कि वह उस पर भरोसा रखें विश्वास करें कि मैं तुमसे प्रेम करता हूं तब भी जब तुम उस कारण को नहीं जानते क्यों मैंने कुछ बातों को इंकार किया है इस वृक्ष के फल को खाने से इंकार किया है यह 17:59 बहुत जरूरी है पाना कि पर देखना कि परमेश्वर ने कभी आदम को यह कारण नहीं दिया। अगर आप तभी आज्ञा मानोगे जब परमेश्वर आपको कारण देगा कि वो आपको आज्ञा मानना है। फिर वो विश्वास की आज्ञाकारिता नहीं है। आज्ञाकारिता का सर्वोच्च प्रकार 18:14 है विश्वास की आज्ञाकारिता। वो है सबसे ज्यादा आत्मिक उन्नति करने का जरिया। अगर आप परमेश्वर की आज्ञा तभी मानोगे जब आप कारण जान जाओगे। यह अच्छा है कि आप परमेश्वर की आज्ञा मान रहे हो। पर यह सर्वोत्तम नहीं है। रोमियो पहला अध्याय और 18:30 रोमियो 16 में लिखा है विश्वास की आज्ञाकारिता और वो क्या है कि विश्वास की आज्ञाकारिता के विरुद्ध क्या है? तर्क की आज्ञाकारिता कि मैं जानता हूं। मैं समझ गया हूं। मुझे यह क्यों करना 18:50 है? इसलिए मैं यह कर रहा हूं। क्या होगा अगर आप नहीं जानोगे कारण तो? यह आज्ञाकारिता का एक उच्च स्तर है। और परमेश्वर जब उसने आदम को एक आज्ञा दी कि तुम उस भले भूले के वृक्ष को मत खाना तो उसने उसको कारण नहीं दिया। परमेश्वर उसको आसानी से 19:09 25 कारण दे सकता था। क्यों तुम्हें नहीं खाना है। पर उसने बस यह कहा कि तुम नहीं खाना। जब तुम उसको खाओगे तो तुम मरोगे। पर परमेश्वर ने उसको कारण नहीं दिया। आज क्योंकि परमेश्वर ने हमें पवित्र आत्मा को दिया है। हम कारण जानते हैं। 19:29 इन दो वृक्षों के बीच का अंतर यही था। जीवन का वृक्ष और भले बुरे के ज्ञान का वृक्ष। उन दोनों के बीच का अंतर यह था। एक में आदम ऐसा जीवन चुन सकता था जो अपने आप में 19:47 केंद्रित था कि अगर मैं जानना चाहूं क्या भला या क्या बुरा है मुझे परमेश्वर के पास जाने की जरूरत नहीं मैं खुद उसको जानता हूं। मैं अपने ही समझ का सहारा लेकर यह तय कर सकता हूं क्या भला है, क्या बुरा है। यह मृत्यु का मार्ग है। दूसरा वृक्ष जो था वो 20:06 था जीवन का वृक्ष। वह खुद परमेश्वर और पवित्र आत्मा की सामर्थ को दर्शाता था और अगर मैं उस फल के अनुसार जीना चाहूं तो मैं यह कह रहा हूं प्रभु मैं आप पर निर्भर रहना चाहता हूं। जब कभी मैं जानना चाहता हूं क्या भला है क्या बुरा है मैं अपनी 20:20 समझ का सहारा नहीं लूंगा मैं आपके पास आकर कहूंगा प्रभु क्या यह मेरे लिए अच्छा है करना यह एक ऐसा जीवन है जो हर समय परमेश्वर पर निर्भर हो बुद्धि के लिए जीवन के लिए हर दिन और अगर मेरे पास कितने भी साल का अनुभव 20:40 क्यों ना हो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सोचिए एक डाली जो एक वृक्ष में है शायद उसके पास 50 वर्षों का अनुभव है फल लाने का पर उसको फिर भी उस वृक्ष में बना रहना है अगर उसको फल लाना है आज तो और यह बिल्कुल दिन प्रतिदिन है निर्भर 21:01 रहना वह नई डाली उसको वृक्ष में उतना ही बना रहना पड़ता है फल लाने के लिए जितना यह दूसरी डाली है जो शायद 25 साल से फल ला रही कोई फर्क नहीं पड़ता। 50 साल क्यों ना हो। यीशु मसीह ने कहा मुझसे अलग होकर तुम फल 21:18 ला ही नहीं सकते। तुम कुछ नहीं कर सकते। जीवन का वृक्ष यह बात दिखाता था। एक ऐसा जीवन जो परमेश्वर पर निर्भर है वो है विश्वास का अर्थ। विश्वास से जीने का अर्थ। प्रभु आप मुझे बताइए क्या यह अच्छा है या बुरा है? और यह दिन प्रतिदिन परमेश्वर के पास से 21:37 हमें प्रकटीकरण मिलता है जो वह मुझे दिखाता है क्या गलत है उससे हम दूर रहते हैं। ऐसा ही यीशु जीता था और वैसे ही परमेश्वर चाहता है कि आप और मैं जिए पर जैसे मैंने पहले भी कहा दूसरा है भले बुरे के ज्ञान का वृक्ष जहां मुझे परमेश्वर से सलाह पाने की जरूरत नहीं और 21:56 वैसे ही इस संसार के सारे मनुष्य जीते हैं। क्या इस संसार के सब लोग बुरा जीवन जी रहे हैं? बिल्कुल नहीं। कई लोग बहुत अच्छे काम करते हैं पर वो परमेश्वर पर निर्भर नहीं रहते। परमेश्वर ने हमें इसलिए नहीं बनाया कि हम अच्छे कामों को करें। 22:10 उसने हमें इसलिए बनाया कि हम उस पर निर्भर रहे कि उस जीवन के वृक्ष के अनुसार हम जिए और उस भले बुरे के ज्ञान से नहीं जहां हम आप अपने आप पर निर्भर हो। क्योंकि एक ऐसा मार्ग है जो मनुष्य को ठीक जान पड़ता है। नीति वचन 14 और 16 अध्याय में लिखा है। 22:27 परंतु उसके अंत में मृत्यु ही मिलती है। नीति वचन 3 5 छ में लिखा है तू अपनी समझ का सहारा ना लेना वरन संपूर्ण मन से यहोवा पर भरोसा रखना उसी को स्मरण करके सब काम करना तब वह तेरे 22:45 लिए सीधा मार्ग निकालेगा और हम यहां देखते हैं उस वचन में कि विश्वास का शत्रु वह हमारा तर्क अपनी खुद की समझ है। अगर मैं अपनी ही समझ का सहारा लूंगा तो मैं भटक जाऊंगा और इसलिए 23:05 परमेश्वर पर भरोसा रखने के लिए कहा गया है और अपनी समझ का सहारा ना ले। अपने समझ का सहारा लेना उस भले बुरे के वृक्ष का फल खाना है। मेरा मेरी समझ मुझे कहता है क्या अच्छा है मैं वह करूंगा और मेरी समझ मुझे बताती है क्या गलत है मैं वह नहीं करूंगा। 23:20 मुझे प्रार्थना करने की जरूरत नहीं। मुझे परमेश्वर से सलाह लेने की जरूरत नहीं। जब आप अपना मसीह जीवन परमेश्वर की इच्छा खोजे बिना जिओगे कि आपके लिए क्या भला है। आप खुद चुनते हो क्या अच्छा है आपके लिए तब आप उस भले बुरे के वृक्ष के हिसाब से जी 23:37 रहे हो जो आदम ने भी चुना और हम सब वो संक्रमण को प्राप्त कर चुके हैं और मैंने आपको यह वचन इस प्रकार समझ जाने की कोशिश की है कैसे मनुष्य जाति में पाप का प्रवेश हुआ इस ऐसे ही तो प्रवेश हुआ था अपने समझ के अनुसार जीकर 23:58 हम अपने आप तय करते हैं क्या हमारे लिए अच्छा है? अब विश्वास की आज्ञाकारिता क्या है? अगर हवा ऐसा जवाब देती जब शैतान ने आकर हवा से कहा क्यों परमेश्वर तुम्हें इस फल 24:16 को नहीं खाने दे रहा क्योंकि वह जानता है कि तुम उसके जैसे बन जाओगे और वह नहीं चाहता कि तुम उसके जैसे बनो। अगर हवा उसको इस प्रकार उत्तर देती। देखो मैं तो नहीं जानता कि कारण क्या है पर मैं यह जानती हूं परमेश्वर मुझसे प्रेम 24:31 करता है और जब वह मुझसे प्रेम करता है तो यह संभव ही नहीं है कि मेरे लिए कोई भली बात वो मुझसे दूर रखे या इंकार करे अगर वो ऐसा कहती तो मैं तो नहीं समझ सकती कि मेरे समझ के हिसाब से तो वह अच्छा दिख रहा है। अच्छा फल है और परमेश्वर ने मुझे यह फल 24:46 देना चाहिए पर उसने मुझे नहीं दिया है। पर मैं जानता जानती हूं कि परमेश्वर मुझसे प्रेम करता है। और यद्यपि मैं नहीं समझ पाती कि क्यों उसने इंकार किया है। मैं उसकी आज्ञा मानने वाला हूं। क्या ही बड़ा अंतर होता वो उस कहानी में और क्या एक 25:00 बड़ा अंतर होता उस कहानी में अपने आपके जीवन में जब आप ऐसे परिस्थिति का सामना करते जब आप नहीं समझते उसको और आप कहते हो मैं नहीं समझ सकता मेरे पास इसका स्पष्टीकरण नहीं है पर मैं जानता हूं कि परमेश्वर एक अच्छा परमेश्वर है और उसकी 25:13 बुद्धि मेरे से बढ़कर है और वो जो कहे मैं वही करूंगा और आपका जीवन में भी बहुत बड़ा अंतर आएगा। आइए हम इन वचनों से सीखें और सीखें कि परमेश्वर पर निर्भर रहकर जिए बुद्धि के लिए कि क्या भला है और क्या बुरा है। परमेश्वर आपको आशीष